सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी के लिये गरिमा के साथ जीने का अधिकार सबसे बड़ा मानवाधिकार है

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी के लिये गरिमा के साथ जीने का अधिकार सबसे बड़ा मानवाधिकार है, जिसके अंतर्गत समलैंगिक अधिकारों को भी मान्यता मिलनी चाहिये। समान लिंग के दो लोगों की शादी को कानूनी मान्यता के लिए अप्रैल 2022 में लोकसभा में प्राइवेट बिल पेश किया गया था, जिसे नहीं मिल सकी। लिव इन और समलैंगिक पार्टनर्स के अधिकारों पर सुझाव दे विधि आयोग

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इसलिए ऐसे किसी भी निर्णय पर विचार के लिए संसद से कानूनी बदलाव करना आवश्यक होगा। समलैंगिक जोड़ों की शादी को मान्यता देने के लिये दो याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करके सरकार से जवाब मांग की है।

नाल्सा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के फैसले से लैंगिक आधार पर भेदभाव को असंवैधानिक बताया था। अगस्त 2017 में पुटुस्वामी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने प्राइवेसी के दायरे में यौन रुझान, व्यक्तिगत घनिष्ठता, पारिवारिक जीवन, शादी और प्रजनन आदि के अधिकारों को मान्यता प्रदान की थी।

उस फैसले के आधार पर सितम्बर 2018 में नवतेज सिंह जौहर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा-377 की व्याख्या करते हुए समलैंगिक संबंधों को कानूनी अपराध के दायरे से अलग कर दिया था।

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उस फैसले में जजों ने कहा कि अंग्रेजों के समय बनाये गये 158 वर्ष पुराने कानून के कारण एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर) समुदाय के लोगों को तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी को गरिमा के साथ जीने का अधिकार सबसे बड़ा मानवाधिकार है, जिसके तहत समलैंगिक अधिकारों को भी पूरी से तरह मान्यता मिलनी चाहिये।

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शादी के मामलों से जुड़े कानूनी विवादों पर विधि आयोग सुझाव दे

सुप्रीम कोर्ट में फाइल दोनों याचिकायों में याचिकाकर्त्ता कई सालों से कपल के तौर पर साथ रह रहे हैं। द गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 120 देशों में समलैंगिकता को कानूनी अपराध नहीं माना जाता लेकिन सिर्फ 32 देशों में समलैंगिक विवाह को कानून या फिर अदालती फैसलों से मान्यता प्राप्त हुईं है।

यमन, ईरान जैसे 13 देशों में समलैंगिक सम्बंधों को कानूनी अपराध मानते हुये मौत की सजा का प्रावधान लागु है। दुनिया में पहली बार नीदरलैंड ने सन् 2001 में समलैंगिंक शादी को अनुमति प्रदान करने के लिए कानून बनाया था।

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अमेरिका में समलैंगिंक सम्बन्धों को अनुमति 2003 में मिली और शादी के लिए कानून 2015 में बनाया गया। भारत में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के बाद से ही समलैंगिक शादी की मान्यता के मामले ने लगभग पकड़ बना ली है।

भारत में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल जबकि लड़कों की शादी की उम्र 21 साल है।  इसमें समानता प्रदान करने के लिये कानूनी बहस चल रही है। मुस्लिम लड़कियों के लिए पर्सनल लॉ की बजाये कानून के अनुसार 18 साल की न्यूनतम उम्र करने पर भी हाईकोर्टों के अलग-अलग फैसलों पर विवाद चल रहे हैं।

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समलैंगिक जोड़ों की शादी के मामलों से विवाह के कानून पर चल रहे विवादों का दायरा और बढ़ गया है।  विधि आयोग के नये चेयरमैन की नियुक्ति के बाद समान नागरिक संहिता के राष्ट्रीय विषय में बात हो रही है। उसके साथ शादी से जुड़े कानूनी विवाद के मामलों पर भी विधि आयोग को राय देने की आवश्यकता है।

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समलैंगिक जोड़ों की अदालत से मांग

भारत में विभिन्न धर्मों में शादी की मान्यता के लिए कई तरह के  नियम कानून हैं। हिंदू, बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म के लोगों के लिये हिंदू विवाह के अंतर्गत अधिनियम-1955 है जबकि ईसाईयों के लिए विवाह के अंतर्गत क्रिश्चयन मैरिज एक्ट-1872 है।

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 इसी तरह मुस्लिम अपने धार्मिक कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत विवाह करते हैं। इन सभी कानूनों के अनुसार सिर्फ पुरुष और महिला के बीच शादी हो सकती है। केरल और दिल्ली समेत कई हाईकोर्टों में इस बारे में 9 याचिकायें लम्बे समय से दर्ज हैं।

 सुप्रीम कोर्ट के नये आदेश के बाद ऐसे सभी मामलों की सुनवाई एक साथ होगी। दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने ऐसी याचिकाओं का विरोध किया था। सरकार के अनुसार भारत में कानून और परंपरा के अनुसार सिर्फ पुरुष और महिला के मध्य विवाह की अनुमति है।

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सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि ऐसे मामलों में सुनवाई की कोई किसी भी प्रकार की संस्था नहीं है। अधिकांश समलैंगिंक जोड़े कई सालों से एक साथ में रह रहे हैं और मैरिज सर्टिफिकेट के बगैर कोई नुकसान नहीं हो रहा। लेकिन याचिकाकर्त्ताओं के अनुसार उनकी शादी का रजिस्ट्रेशन नहीं होने से उन्हें 15 तरह के कानूनी अधिकारों का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

 इनमें उत्तराधिकार, सरोगेसी, गोद लेने, बैंक खाते, टैक्स लाभ, ग्रेचुएटी, पासपोर्ट, सम्पत्ति के अधिकार जैसे  मुद्दे शामिल हैं।

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याचिकाकर्त्ताओं के अनुसार स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के अंतर्गत क्षेत्र, जाति और धर्म के दायरे से भी बाहर शादी हो सकती है। तो फिर इस कानून की लिंग निरपेक्ष पर चर्चा भी होनी चाहिये। जिससे की समलैंगिक जोड़ों की शादी की कानूनी रजिस्ट्रेशन हो सके।

 संसद के पास संवैधानिक शक्ति विवाह कानूनों में बदलाव के लिए 

भारत में -इन रिश्तों को अदालती फैसलों से अप्रत्यक्ष तौर पर कानूनी मान्यता मिल गई है। ऐसे रिश्तों का कानून के अंतर्गत शादी का रजिस्ट्रेशन हो सकता है। उसके बावजूद पार्टनर बिना मैरिज सर्टिफिकेट के सारे अधिकार हासिल कर रहे हैं। तो फिर इन की तर्ज पर समलैंगिक जोड़े भी अपने कानूनी अधिकारों को प्राप्त कर सकते हैं।

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भारत के संविधान में शक्तियों का पूर्ण रुप से विभाजन है।  इसके अनुसार मौलिक अधिकार के नियम का उल्लघंन और किसी प्रकार की विसंगतियों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट किसी कानून को आंशिक या पूर्ण से निरस्त या रद्द कर सकती है। इसलिए समलैंगिकता को अनापराधिक घोषित करने पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोई संवैधानिक सवाल नहीं खड़े हुये।

इसी प्रकार से आईटी एक्ट की धारा-66 ए को भी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। लेकिन नया कानून बनाने या पुराने कानून में बदलाव करने की शक्ति सिर्फ संसद के पास ही है।

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 स्पेशल मैरिज एक्ट के अंतर्गत समान लिंग के दो लोगों की शादी को कानूनी मान्यता प्रदान करने के लिए अप्रैल 2022 में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में प्राइवेट प्रस्ताव पेश किया था, जो सदन में पास नहीं हुआ ।

 इसलिए विवाह कानून को लिंग निरपेक्ष बनाने में नये कानून के बारे में सुप्रीम कोर्ट सरकार को निर्देश जारी कर भी दे तो भी उस पर विचार के लिए संसद से कानूनी बदलाव करना जरुरी होगा।

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